रविवार, 14 मार्च 2010

पिंजरे से कइलऽ यारी...- धर्मेन्द्र सुशान्त


जेल की कोठरी में यह पहली रात है।
कब आँख लगी, पता नहीं चला। नींद तो आयी ही नहीं, बस जो कुछ दिख रहा था उसके और अपने बीच एक परदे की जरूरत लगने लगी थी, सो पलकें गिरा लीं। कितनी देर इस तरह पड़ा रहा, पता नहीं चला। अब आँख खुलने पर देह की थकान थोड़ी धुल-सी गई मालूम पड़ रही है। नजर घुमायी- चारों ओर दीवारें। दरअसल तीन तरफ दीवारों का घेरा है और सामने ताला लगा दरवाजा। विशाल जंगला-सा, लोहे की मोटी-मोटी छड़ों वाला। उसके आगे ओसारा भी दिख रहा है। उसी में ड्यूटी पर तैनात पहरुआ खडा है, बीच-बीच में उसकी चहलकदमी की आवाज सुनाई दे रही है। ओसारे के नीचे खुला सहन है। कल यहाँ आते वक्त सहन में पसरी दूब पर नजर पड़ी थी। ओसारे के ओटे के कारण अब कोठरी से वह नहीं दिख रही है। उसका कोई खयाल नहीं था। अभी नहीं दिखी, तब उसका खयाल आ गया।...ऐसा ही होता है बेखयाली में ही कितनी चीजें मन की कोठरी में जमी रहती हैं। लेकिन जब तक रहती हैं, तब तक उनका खयाल नहीं आता।
ओटे से आगे, जहां सहन की सीमा है, सीधे सामने वाले वार्ड की दीवार खडी है। एक काला पहाड़-सा। बाहर ओसारे में रखी लालटेन की रोशनी मानो थका-हार कर हाथ-पाँव समेटे सो गई है। बाहर के अँधेरे में उसका आभास-भर हो रहा है, और उसी के भरोसे अपने आस-पास के वातावरण का भी। कल आते वक्त सब पर नजर पड़ी थी। पहले-पहले परिचय की उत्सुकता निगाह से देखता हुआ यहाँ तक पहुँचा था। छपरा से यहाँ तक आते-आते दिन लगभग बीत चुका था। बेर डूबने में ज्यादा वकत नहीं रह गया था। तब भी उजास बाकी थी। गाड़ी से उतरने के बाद देखा- सामने का विशाल फाटक। बक्सर जेल का सदर दरवाजा। हाथ खुले नहीं थे; कमर में भी रस्सा था। अगल-बगल रस्सा थामे सिपाही थे। फिर सामने नजर गई, जेल के सदर दरवाजे पर लिखा था- बक्सर सेंट्रल जेल। जेल की गेरू पुती लाल दीवार ढलते सूरज की लाली के संयोग से और लाल हो रही थी। एक क्षण सोचा, सूरज डूब रहा है......कहाँ-कहाँ सूरज डूब रहा होगा...।
तभी फाटक खुला।
सिपाही मुझे लेकर भीतर चले आए। पीठ पीछे फाटक के बंद होने की आवाज हुई। घिसटती हुई भारी आवाज। फिर जेलर के चेम्बर में लिखा-पढ़ी चली। लिखा पढी के दौरान जेलर ने मुझसे काफी नरमी दिखाई। शायद वह भी मेरे गीत-गवनई से वाकिफ था। लेकिन तब मेरे भीतर मानो कल लग चुका था। मैंने कठपुतरी की तरह खडा रहा। कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। सारी खानापूरी हो चुकी, तो कोठरी का नम्बर मिला। फिर सिपाही यहाँ लाकर छोड़ गया।
ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरा थोड़ा चौड़ा-सा एक गलियारा पार कर कोठरी तक आया। गलियारे के ऊपर टुकड़ा भर आसमान तना था। साँझ का आसमान। आँख उठाते ही एक तारा दिखा, फिर ओझल हो गया था...
दूब के ऊपर खुले में अभी भी आसमान फैला होगा। सोचा, जब जमीन की दूब नहीं दिख रही है, तो आसमान कहाँ से दिखेगा। अब आसमान कहाँ...। अचानक खटका लगा। लगा कि पहरुआ के बूटों की आवाज होगी, लेकिन बाहर तो शांति है।
मन की ही आवाज थी। उसी से बेमतलब के सोच के सिलसिले में व्यवधान पड़ा। भीतर से एक सवाल उठ आया था। जेल की कोठरी में आकर क्या सोचने लग गए? यह कौन-सा विचार पनप रहा है?
कहते हैं श्मशान में जाने पर आदमी बैरागी होने लगा है। गंगाजी की बहती धार और चिता से उठती लपट देखकर उसे बाहर का बाजार बेरंग मालूम पड़ने लगता है।
क्या जेल का एकान्त भी वैराग पैदा करता है?...पीछे से एक और सवाल उभरा। कहीं पछतावा तो नहीं हो रहा...?
फिर खटका लगा। यह सब मैं क्या सोच रहा हूँ; क्यों सोच रहा हूँ। एक के बाद एक कितनी बातें चली आ रही हैं! वैराग...पछतावा...डर...कितने सवाल उठ रहे हैं।
मन के किसी कोने से उत्तर आया-यह कोई नयी बात है क्या?
सचमुच नयी बात नहीं है यह। सवाल तो रोज ही उठते रहे। इतने उठते रहे कि यदि सबका जवाब देने बैठ जाता, तो उसी में उमर बीत जाती। क्या-क्या नहीं सुनता आया हूँ लोगों के मुंह से। मुँह पर कोई नहींे कहता, मगर पीठ पीछे की बात भी घूम-फिरकर आ ही जाती थी...।
मन ने एक नयी दिशा पकड़ ली।
लेकिन वह तो लोगों की बात थी। आज तो खुद ही सवाल उठा रहे हो।
हाँ, बाहर था, तो अपने में रहता रहा। अब भीतर आ गया हँू तो बाहर भटक रहा हूँ।
सच-सच बोलो मिसिर!
लगा, जैसे आइने के सामने खड़ा होकर अपनी ही सूरत को पहचानने की कोशिश कर रहा हूँ। नहीं, नहीं मैं झूठ नहीं बोल रहा। बस कहने का फेर समझो। सच तो यह है कि जब अपने में रहता था, तब भी भटकता ही रहता था और आज भी भटक ही रहा हूँ। कभी भीतर की यात्रा...कभी बाहर की। कब यह बात पड़ गई, आज तक पता नहीं चला। कई बार पीछे नजर घुमाकर देखने की कोशिश की है। लेकिन उस ठाँव तक नजर नहीं पहुँचती। बहुत जोर देने पर बचपन की एक बात याद आती है। गाँव के एक थे सरीखन बाबा। सब शौक-श्रद्धा भोग-भागकर पकी उमर में उनका चोला छूटा। उन्हीं का मंजिल जाता देखा था। तब मेरी उमर कितनी थी, सही-सही याद नहीं, कोई सात-आठ साल या छह-सात साल रही होगी। उस समय समझने की उमर नहीं थी; अब जानता हूँ कि उमर पूरी करने के बाद वे गुजरे थे, इसीलिए उनकी मंजिल में शामिल लोग दुःखी होने की बजाय खुशी का इजहार करते चल थे। उस समय तो बस यही दिखा था कि आगे-आगे रंथी लेकर चार जने चले जा रहे थे और पीछे-पीछे गाँव-घर थे लोग। उन्हीं के बीच से उठती ढोल-झाल की आवाज भी सुनी थी और सुना था मंजिलहांे का समवेत स्वर में गाना।
हमके ओढ़ावहू चदरिया,
हो चलन के बेरिया।
उस दिन का सुना यह गीत फिर कभी बिसर नहीं पाया। तब अर्थ नहीं समझा था। (यह भी नहीं किसी ने बताया कि यह कबीरदासजी का निरगुन है, यह जानना बहुत बाद की बात है।) समझने की कोई चाह भी नहीं उठी। लेकिन क्या जाने, कैसे धीरे-धीरे गाँव से बाहर जा रहे उस मंजिल से उठते गीत की दर्द-भरी पंक्ति मेरे मन में उतरती चली गई। उन्हीं दिनों बाद में एक दिन मैं यूँ ही उस निरगुन की पंक्तियों गाने लगा, तो माई ने पहले तो चौंक कर पूछा-का गा रहे हो? फिर तुरन्त डाँटकर चुप करा दिया।...तो वैराग भी बहुत पहले से ही साथ लग गया था।
तब तो धूनी रमा सकते थे?
लकड़ी जला कर, चिमटा गाड़ कर धूनी रमाना-मैंने कभी नहीं सोचा। क्या लकड़ी के सुलगने से ही धूनी लगती है। एक आग भीतर भी लगती है...
तो क्या कोई गलती कर डाली?
गलती कोई नहीं की। अपने जानते आज तक नहीं की। केवल एक बार मन जरूर काँपा था। जब बाबू हलवंत सहाय को वचन चुकने के बाद अपनी ही बात पर विचार किया था। यारी निभाने के उत्साह में वचन दिया था और लगे हाथ उनसे वचन लिया भी था। लेकिन तब भी एक बार मन में विचार उठा था, कहीं दोस्ती निभाने के जोम में एक बेकसूर की जिन्दगी का नाश करने के रास्ते पर तो नहीं बढ़ चला! खुले आसमान में रहने वाली एक चिड़ईं को पिंजरे में ला रखने की ही तो बात थी। कहीं चिड़ईं पिंजरे में बंद होकर मर गई तो...? लेकिन जुबान से बात निकल चुकी थी, सो इस संशय को वहीं छोड़ दिया। सहायजी के वचन का भी भरोसा था, सो ढेला को उनकी कोठी में लाकर रख दिया। जिस रात ढेला को उठाकर ले आया, उस समय उसने क्या सोचा होगा, अपने मन से समझा हूँ। उससे कभी पूछने की हिम्मत नहीं हुई। पूछने की बात भी नहीं थी। उस समय की एक-एक बात आज फिर याद आ रही है। उस रात के बाद से यह प्रसंग हर साँस के साथ याद आता रहता है। उस समय मैं ढेला के सामने नहीं गया था। लेकिन बाद में सहायजी की कोठी में आने पर सारी बात उसे पता चली थीं। आसमान की चिरईं पिंजड़े में आ चुकी थी। बेमन-बेबस। उसने मुझे रावण समझा होगा। सब कुछ उसकी इच्छा के बिना हुआ था। लेकिन ढेला ने मेरा मान रख लिया। उसने अपने पंखों की बलि देकर सहायजी के पिंजरे को अपना ठिकाना मान लिया। मुझे इसका सन्तोष रहता, यदि बीच में एक और बात न आ जाती। सहायजी का पिंजरा सोने का था, मगर ढेला को उसमें चैन कैसे मिल सकता था। सहायजी अपने वचन पर चले, तो ढेला भाग्य मानकर उनकी छाँव में रहने लगी। लेकिन तब क्या पता था कि मेरा मान रखने के लिए अपना सब कुछ तज देने वाली ढेला मुझसे कुछ चाह बैठेंगी। ढेला की दिल की बात जल्द ही पता चल गई थी मुझे। मगर अब क्या हो सकता था। मन में एक भारी टीस उठी। ढेला मेरे मित्र की दूसरी घरनी हो चुकी थी। इसी का तो मैंने सहायजी से वचन लिया था। पर, ढेला से कहाँ पूछा था। जो कुछ हुआ, उसमें ढेला की इच्छा कहाँ थी! मैंने ढेला से कुछ नहीं कहा। उसने भी मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। दोनों दो किनारों की तरह खड़े रहे, लेकिन बिना कुछ कहे भी बीच में जो गंगा फूट पड़ी थी, उसकी धार ने दोनों की भीतर-भीतर दूर तक ओदा कर दिया था।...मर्यादा भी अजब चीज है...चुपचाप खुद पर एक और भेंवता (पाश) डाल लिया-एक और मर्यादा।......
ढेला के उत्तरदायित्व सेे मैं भी कभी भाग नहीं सकता; नहीं भागूँगा-तब ऐसा ही सोचा था। यह बात किसी मंच पर खड़े होकर नहीं कही थी, न ही इसका कोई साक्षी था। यह मेरे भीतर की आवाज थी; उसे मैंने ही सुना था और उससे मुकर नहीं सकता था।
आज जेल की इस कोठरी में इन बातों को याद करते हुए एक टीस फिर उभर रही है। सच कहूँ, तो यह टीस भी तभी की है। आज फिर ताजा हो रही है, मगर यह टीस है, पछतावा नहीं।
फिर मन के एक कोने से एक सवाल आया-आखिर इस घाव को पालने के लिए किसने कहा था? अभी टीस उठ रही है, मगर जब ढेला ने कुछ समझाया, तो उसकी भी बात तो नहीं मानी!
हँसने को जी कर रहा है। इससे पहले पता नहीं था कि मेरे भीतर ऐसा काइयाँ वकील भी बैठा हुआ है। घाव पालने के लिए किसको कौन रहता है? ढेला ने मुझे जो कुछ समझाया, उसके मूल में था मेरे प्रति उसका नेह-नाता। मेरे हाथ में हथकड़ी पड़ने से दुःखी होने वाले कई हैं, पर ढेला का दुःख दूसरी चीज है। अब तो सहायजी भी नहीं रहे। ढेला मुझे कैद में नहीं देखना चाहती थी। शुरू में तो लगा था कि भवसागर पार करने का ही फरमान आएगा। ऐसा हो जाता, तो ठीक ही रहता। मैं तर जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जो हुआ, ढेला वह भी नहीं चाहती थी। अपने वयस का खयाल नहीं करके वह भाग-दौड़ कर रही थी। लोक-लाज का भी खयाल नहीं किया।......जो पहले कहते थे, वे अभी भी कहते होंगे; कह रहे होंगे। ......उसने हेमू बाबू (बैरिस्टर हेमचंद्र बनर्जी) को ठीक किया। नगर के सबसे नामी बैरिस्टर हेमू बाबू मेरी पैरवी के लिए तैयार हो गए। हेमू बाबू की नजर अलग थी। वह कायदा-कानून की नजर सेे चीजों को देख रहे थे और उसी आधार पर उनहोंने मेरे बचने का जुगत निकाला, जबकि ढेला के लिए मेरा मुकदमा तो जीने-मरने का सवाल था। वह आँख से नहीं, दिल से इस मसले को देख रही थी। तभी तो उसने सच-झूठ का विचार किए बिना हेमू बाबू की युक्ति मानकर मुझे वही करने को कहा।
जिस दिन गाँव में गिरफ्तारी हुई, उसके बाद खबर मालूम होते ही ढेला बेचैन होकर दौड़ने लगी थी। पकडाने के बाद मुझे छपरा जेल में रखा गया था। हेमू बाबू से बातचीत करने के बाद वह मुंशीजी को साथ लेकर जेल के फाटक पर चली आई थी। मुलाकात के पूरे समय वह यही समझाती रही कि मैं नोट छापने की बात से मुकर जाऊँ। मैंने कहा, ‘‘यह तो झूठी बात होगी।’’ इस पर उसने कहा, ‘‘सच- झूठ का आप विचार छोड़िए, जो कहा जा रहा है, वह करिए।...जान है तभी जहान है।’’ उसने बताया कि हेमू बाबू ने सलाह दी है कि यदि मैं अपनी करनी से मुकर जाऊँ और साथ पकड़े गए बाकी लोगों पर दोष लगा दूँ, तो वे मुझे बचा सकते हैं। इस पर मैं क्या कह सकता था। एक बात मन में आयी, आज तो पूरा देश ही जेलखाना बना हुआ है। हेमू बाबू की जुगत इस जेल से निकाल लेगी, मगर देश को जेलखाना बनाने वाली दीवार किस जुगत से टूटेगी...।
ढेला अपनी बात दोहराती रही। मुंशीजी उसकी हाँ में हाँ मिलाते रहे। मैंने कलेजे पर पत्थर रख लिया। चुप लगा गया। मुलाकात का वक्त गुजर गया, तो सिपाही ने चलने का इशारा किया। ढेला को जाना पड़ा। वह मुड़-मुड़कर देखती हुई गई। मैं भी उसे देखता रहा, पर आँख मिलाने से बचता रहा।
मन में फिर एक सवाल उमर रहा था-इतना सारा आदर्श बघार रहे हो, इसका सच क्या है, क्या यह ढेला के खोने का गम है?...यह सारा द्वन्द्व; यह सारा उलझाव किसलिए...... सूतों के उलझाव से ही तो चादर का सिरजना होता है, लेकिन मेरी जिन्दगी के चादर की ताना-भरनी तो ऐसी उलझी कि ‘जस-की-तस’ रखना अब मुमकिन न हो शायद...। इस बखत कबीर साहेब याद आ रहे हैं...
ढेला को जाते देख बस मुँह से यही निकला, ‘‘ढेला, मेरी फिक्र छोड़ो...।’ लेकिन आधी बात मुँह में ही रह गई।
पता नहीं घर जाकर ढेला किस मनःस्थिति में रही। मगर कचहरी में जिस सुनवाई के बाद सजा मुकर्रर हुई, उस सुनवाई के दिन तो ढेला जैसे जीते-जी मर गई। ढेला से बेहतर मुझको कौन समझता था। उसे भरोसा था कि मैं हेमू बाबू का बतलाए उपाय पर अमल करूँगा। पर इजलास में खड़े होकर, जज के सामने जब मैंने उसके सवाल के जवाब में ‘हाँ’ कर दिया, तब भीड़ में खड़ी ढेला एक पल उसकी ओर देखकर मैंने की आँखें पथरा र्गईं। जान-बूझकर उसकी ओर से नजर मोड़ ली। ढेला ने सोचा होगा, मैंने उसे धोखा दिया।
कचहरी में जज ने मुझसे पूछा था, ‘‘क्या तुम जाली नोट छापते थे?’’ वह एक निर्णायक क्षण था। सबकी निगाहें मुझ पर टिकी थीं, पर मैं नहीं देखते हुए भी ढेला को देख रहा था। सरकारी गवाह के कटघरे में सी. आई. डी. इंस्पेक्टर जटाधारी प्रसाद भी मेरा ‘हाँ’ सुनकर चौंक गए थे। मेरे बाबूजी, गांव-परिवार के और भी लोग, जो सभी भीड़ में खड़े थे, मेरा ‘हाँ’ सुनकर सब पर बजर-सा गिरा। हेमू बाबू हैरत में थे। लेकिन मैं अपने मन का बोझ उतरा हुआ महसूस कर रहा था। इसलिए जब जज ने चालीस साल की कैद की सुनाई, तब भी मेरे मन में हलचल नहीं हुई। यह रास्ता तो खुद मैंने ही चुका था...।
अचानक चुहचुहिया की बोली सुनाई पड़ी। इसका मतलब भोर होने में अब ज्यादा देर नहीं है। अजब लगा, जेल में चुहचुहिया कहाँ से बोली। तुरन्त खयाल आया कि यहाँ पाबंदी आदमी के लिए है, चिड़िया-चुरंग के लिए नहीं। फिर सोचा, आवाज के लिए फाटक का कोई मतलब नहीं है। वह तो कहीं भी पहुँच सकती है। इसी के साथ एक पुराना निरगुन याद आया-पिंजरे से कइलऽ इयारी ए सुगना...
गाने का कोई इरादा नहीं था, पर जाने किस जोम में गुनगुनाने लगा। तभी पहरुआ की आवाज सुनाई पड़ी-‘‘मच्छर काटत बा का मिसिरजी?’’ बस, निरगुन वहीं रुक गया। बाहर नजर गई। सामने वाले वार्ड की दीवार पर स्याही कम हो गई थी। अँधेरे में की जगह उजास पसारने लगी थी।

लोक कवि-गायक महेन्दर मिसिर के मिथकीय जीवन पर लिखे जा रहे उपन्यास का अंश

1 टिप्पणी:

شہروز ने कहा…

साथियो!
आप प्रतिबद्ध रचनाकार हैं. आप निसंदेह अच्छा लिखते हैं..समय की नब्ज़ पहचानते हैं.आप जैसे लोग यानी ऐसा लेखन ब्लॉग-जगत में दुर्लभ है.यहाँ ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है जो या तो पूर्णत:दक्षिण पंथी हैं या ऐसे लेखकों को परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन करते हैं.इन दिनों बहार है इनकी!
और दरअसल इनका ब्लॉग हर अग्रीग्रेटर में भी भी सरे-फेहरिस्त रहता है.इसकी वजह है, कमेन्ट की संख्या.

महज़ एक आग्रह है की आप भी समय निकाल कर समानधर्मा ब्लागरों की पोस्ट पर जाएँ, कमेन्ट करें.और कहीं कुछ अनर्गल लगे तो चुस्त-दुरुस्त कमेन्ट भी करें.

आप लिखते इसलिए हैं कि लोग आपकी बात पढ़ें.और भाई सिर्फ उन्हीं को पढ़ाने से क्या फायेदा जो पहले से ही प्रबुद्ध हैं.प्रगतीशील हैं.आपके विचारों से सहमत हैं.

आपकी पोस्ट उन तक तभी पहुँच पाएगी कि आप भी उन तक पहुंचे.